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10 नवंबर, 2009


ब्लॉग्स (4)
नज़्म तुम्हारी बनते हैं...*******चलो ऐसा कुछ करते हैं,एक दर्द अपना रोज़ कहते हैं,तुम सुनते जाना मेरा अफ़साना,एक नज़्म तुम्हारी हम रोज़ बनते हैं !फूल खिलेंगे नज़्मों के,दर्द की दास्ताँ जब पूरी होगी,समेट लेना नज़्म का हर गुच्छा,मेरे दर्द की निशानी है उन फूलों ... आगे पढ़ें...

गुरु कवि हकीम.. ये जीस्त जमीं की जिल्लत है ...........रफ़्तार-ऐ -मंजिल तेज करो, बटमार समय की किल्लत है कट जाए सफ़र लशकर भागे , ये जीस्त जमीं की जिल्लत है बड़ी देर तमाशा देख लिया , हर फ़न्द को तुने अजमाया अब देर ना कर तू जाने में , सुन देख अजल सर सरसाया मन ... आगे पढ़ें...

उसकी ही तस्वीर देखता हू जताता ऐसा हू -मानो नहीं देखता हू आखिर मै क्यों जीता हू रहकर उखडा उससे मन ही मन बाते करता हू चुप ऐसा रहता हू -मानो नही बोलता हू आखिर इतना दर्द मै क्यों सहता हू क्या है मेरा दुखडा एक धुन सी रहती है वो मेरे भीतर ऊसी कों सुनता रहता हू ... आगे पढ़ें...