तुमधरती
के सरोवर की सुन्दरता
हे कमली ...!
गुलाबी कभी नीली तेरी पंखुरी
तुम्हें हुवा क्यों भरम
यह काम नही प्रेम परम
यह कहता उतर
अम्बर से
एक भ्रमर
तुम अपनी जमीन की जड़ो पर टिकी रहना
नाल पर मुकुट सा
ताल मे
पात पर
अपनी -खिली रहना
गुंजन करता हू मै लीये
एकांत का मधूर स्वर
जैसे गुनगुनाता हौऊ
प्रकृति का मूळ प्यारा
तुम्हारे लीये एक गीत हरदम
यह कहता
उतर अम्बर से
मै
एक भ्रमर
तुम स्थिर हो -जल तरंगो कों सहती
मै चचल उड़ता -जिधर हवा हो चलती
सम्मोहित हो जाता
तुम्हारी परछाई कों भी देख भली
मै
ऐसा ही हू एक अली
पर बिठा
तुम अपने सुकुमार अंक
कर लेती किसी सांझ मे बंद
और तुम्हारी पंखुरीया समेट लेती
अपने सभी अंग
मै तब
प्राण निछावर कर देता
उस मधुयामिनी के संग
फ़ीर
प्रात:खिल जाते तेरे हरेक पंख
पर तेरी आँखों से बहते अश्रु
ओस बूंदों सा नम बन
मुझे बहा ले जाता तब
प्रेम मय जग का मधुर जल
हे कमली
मत कर भरम
यह काम नही
है प्रेम अमर
मै -
कह रहा एक भ्रमर
किशोर
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