नमक की तरह
तुम व्याप्त हो
मुझ जल मे बन समुद्र
और मै हू
नदी के प्रेम की तरह तुममे समाहित
एकांत का तट
हमें
लहरों की तरह
देख रहा है ....मचलते हुवे
होकर आनंदित
धुप कों आत्मसात किये
युग के इस मरुथल मे
अक्षरो की नम बूंदों से
लिखी हुवी एक कविता हो तुम
सदियों तक आगे भी
करती रहोगी तुम मुझे आकर्षित
कभी फूल बनकर
कभी बन निर्झर
कभी अप्सरा सी चंचल
और मै तुम्हारे विराट सौन्दर्य से
हो अभिभूत
सदैव होता रहूंगा
जन्म ले ले कर
हर बार सम्मोहित
यही मेरा सत्य है -
निमग्न रहू तुममे हो एकाग्रचित
और तल्लीन
kishor
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