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उदगार धार्मिक और साहित्यिक ....स्वरचित कविताये ..एवम चिंतन .और सामयिक लेख ....लगता है मेरा कद मुझसे बडा है इसीलिए मेरी देह चली जाती रेल के संग ..और मै छुट जाया करता हू अक्सर ,हजारो सागौन वृच्छो के वन ...{किशोर कुमार खोरेन्द्र } १-"प्राचीन मंदिर मे " धरती के इस बहुत प्राचीन मन्दिर के भीतर जर्जर हो चुके अंधेरो मे उतरकर सीडीया गर्भालय मे उजालो की हो ,कहीं पर कुछ बुँदे पडी यह खोजता हू मै ...आगे पढ़ें... 

कविता पर कविता
, मेरी भावनाए - बहुत देर हुवी जाने कहा गए - सत्य -जरुरी है समझौता -मुश्किल है , -उससे पहले - ओस ... khorendra kumar द्वारा 18 नवंबर, 2009 12:35:00 PM IST पर पोस्टेड
मेरी पसंद
Lagta nahin k saath nibhaaye ga dair tak, Laikin wo mujh ko bhool na paayega dair tak. Jo bhi ... khorendra kumar द्वारा 17 नवंबर, 2009 12:29:00 PM IST पर पोस्टेड
कविताओ पर एक कविता
b> कविताओ पर एक कविता तुम कहाँ गए हम तनहा है वक्त मिले न मिले आओ मेरे पास पास ये बस ... khorendra kumar द्वारा 15 नवंबर, 2009 6:58:00 PM IST पर पोस्टेड
नज़्म तुम्हारी बनते हैं...
नज़्म तुम्हारी बनते हैं... ******* चलो ऐसा कुछ करते हैं, एक दर्द अपना रोज़ कहते हैं, तुम सुनते जाना ... khorendra kumar द्वारा 10 नवंबर, 2009 2:20:00 PM IST पर पोस्टेड